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Thursday, April 23, 2020

Thinking more, Top 3 Moral Story in Hindi

Thinking more, Top 3 Moral Story in Hindi


ज्यादा  सोचने  वाले की कहानी-
Thinking more, Top 3 Moral Story in Hindi
Thinking more, Top 3 Moral Story in Hindi


 यह कहानी उस आदमी की है जो हर ताला या दरवाजा आसानी से खोल सकता था। हर कोई सोचता था कि यह कोई भी ताला इतनी आसानी से कैसे खोल सकता है?

 इसका पता लगाने के लिए एक दिन यह कार्यक्रम रखा गया  जिसमें उस व्यक्ति को एक बड़े चेंबर में डालकर स्विमिंग पूल में डाल दिया गया।  उस चेंबर में एक आपातकालीन  घंटी भी लगाई गई  जिसे वह व्यक्ति चाहे तो दबाकर अपनी हार स्वीकार कर सकता था। वहां पर बहुत सारे लोग उस कार्यक्रम को देखने के लिए आए थे सभी लोग उत्साहित  थे कि यह  दरवाजा खोलकर बाहर कैसे आएगा? जब उस व्यक्ति को एक बड़े से चेंबर में डालकर स्विमिंग पूल में डाला गया तब उस व्यक्ति ने अपनी जेब से एक तार निकाला और ताला खोलने की कोशिश करने लगा।  समय  जा रहा था और उसके लिए ताला खोलना मुश्किल हो रहा था क्योंकि वह पानी में  श्वास लेने में मुश्किल हो रही थी। लोग सोच रहे थे कि जो ताला खोलने में कुछ ही समय  लगाता था  आज उसे इतना समय क्यों लग रहा है ?

 उसका दम घुट रहा था उसे ताला खोलने में परेशानी हो रही थी और उस ताले को खोलने में के लिए उसने अपना पूरा जोर, तरकीब, दिमाग लगा दिया फिर भी वह ताला  खोल नहीं पा रहा था। अंत में उसे हार मानना ही ठीक लगा। उसने आपातकालीन घंटी बजा दी। चेंबर धीरे धीरे ऊपर आ रहा था और वह व्यक्ति अपने आप को हारा हुआ और शर्म महसूस कर रहा था और वह चेंबर के गेट को पकड़ कर  जैसे ही नीचे बैठने की कोशिश की वैसे  ही धक्का लगने से चेंबर का गेट खुल जाता है। उसे पता लगता है कि  चेंबर का दरवाजा बंद  ही नहीं था। उसने सोचा कि जब वह इतनी तरकीब लगा रहा था तब उसके दिमाग में यह क्यों नहीं आया कि शायद दरवाजा बंद ही ना किया गया हो!

 आप चाहे कितने ही प्रतिभावान क्यों ना हो पर अगर आपको ठहर कर सोचना नहीं आता हो तो आपकी प्रतिभा बेकार है। हम चारों तरफ से यही सुनते हैं कि  व्यस्त रहो लेकिन कई बार यही अच्छा होता है कि कुछ भी ना करें क्योंकि जब कुछ नहीं कर रहे होते हैं तो ऐसे ideas आते हैं हैं जो शायद व्यस्त रहते समय नहीं आते । यही कारण है कि जो लोग अपने जीवन में बड़ी-बड़ी   सफलता हासिल करते हैं वह लोग अपने carrier की शुरुआत लगभग 19-20 की उम्र से शुरू करते हैं क्योंकि यह उम्र जिंदगी की सबसे free time  वाली उम्र होती है।

 इसी तरह उस समय वह व्यक्ति अपने आपको साबित करने, लोगों को impress करने  और ताला खोलने मैं इतना ज्यादा व्यस्त हो गया  था कि उसके दिमाग में यह एक बार भी नहीं आया कि शायद इस दरवाजे को बंद(lock) ही ना किया गया हो।

 इसी तरह हम अपनी जिंदगी जी रहे हैं क्योंकि हम मैं से कोई भी  ठहर कर नहीं सोच रहा है। हम हमेशा  व्यस्त रहना चाहते हैं लेकिन सच तो यह है कि-

"जो लोग कुछ नहीं करते वह कमाल करते हैं"


मौका (opportunity) -

 एक बार कोई एक लड़का अपनी जिंदगी से बहुत परेशान  होकर गुरुजी के पास जाता है। और अपने गुरु जी से कहता है कि गुरु जी मैं बहुत परेशान हूं मुझे पैसों की सख्त जरूरत है मैं चाहता हूं कि मेरे माता-पिता खुश रहे और पूरी  दुनिया घूमे और जो मैं चाहता हूं वह पैसों के बिना मुमकिन नहीं हो सकता। गुरुजी ने बोला कि तुम मेरे साथ चलो। गुरुजी उसे एक ऐसी जगह ले  गए  जहां पर बहुत सारे कंकड़ पड़े थे और उस लड़के से कहा  कि इतने सारे कंकड़  में से कोई एक कंकड़ ऐसा है जो हर धातु को सोने में बदल सकता है। वह कंकड़ जिस पर  रखोगे वह सोने का हो जाएगा और  उस कंकड़ की पहचान होगी उसके तापमान से। और लड़के से कहा कि तुम यह सब कंकड़ छूकर ठंडा महसूस करोगे पर वह कंकड़ गर्म महसूस  होगा । फिर तुम अपनी जिंदगी में चाहे जितने पैसे कमा सकते हो  अगर तुम्हें वह कंकड़ मिल गई । वह लड़का बहुत खुश हुआ उसने सोचा कुछ ही महीनों की बात है उसने सोचा रोज के कुछ ही घंटे मुझे इसमें देने हैं पर वह लड़का नहीं जानता था कि वह टास्क जिस गुरु जी ने दिया है   उन्होंने बहुत सोच समझ कर दिया होगा।

लड़का लग गया  उसमें। उसने सारी कंकड़ जो एक तरफ पड़ी थी उन्हें हाथ में लेकर ठंडी महसूस होने पर समुद्र में फेंक देता क्योंकि यदि वह समुद्र में नहीं  फेंकता तो वह कंकड़  पुनः उन्हीं कंकड़ में मिल जाती । इस तरह 1 दिन निकला 2 दिन निकले 1 सप्ताह निकला एक महीना निकला ऐसे करते-करते तीन चार महीने निकल गए उस लड़के को वह गर्म कंकड़ नहीं मिली उसे सभी कंकड़ ठंडी महसूस हो रही थी। अब लड़के की स्पीड बढ़ चुकी थी लेकिन एक चीज  जो वह  भूल रहा था  उसका विश्वास जरूर था कि वह  कंकड़ मिलेगी जरूर लेकिन वह धीरे धीरे कंकड़ को ध्यान से  महसूस करना बंद करता जा रहा था । अब उतना  बारीकी से महसूस नहीं करता जितना कि शुरू में  करता था दूसरी तरफ से यह भी कह सकते हैं कि उसके दिमाग की ऐसी  बनावट हो गई थी  आदत हो चुकी थी कि फटाफट से कंकड़ को लेकर  समुंद्र में  फेंक देता। इतनी मेहनत के बाद पांचवें महीने के किसी दिन में वह  कंकड़ उसे मिल गई और जैसे ही वह कंकड़ उसके  हाथ

 में आई क्योंकि हर कंकड़ को उसको समुंद्र में फेंकने की आदत हो चुकी थी उसने उसे भी फेंक दी उसे फेंकने के अगले ही सेकंड उसने अपने हाथ की अंगुलियां चबा ली उसे बहुत पछतावा हुआ । क्योंकि वह अब उस  समुंद्र से वह कंकड़ वापस नहीं निकाल सकता जो उसने फेंक  दी थी क्योंकि उसके आदत बन चुकी थी  हर कंकड़ को हाथ में लेकर  फेंक देने की लेकिन फेंकने के बाद ही उसे यह महसूस होता है कि उसने  वह कीमती कंकड़ फेंक दी।

जिस दिन आपने अपने हर दिन को हल्के में लेना शुरू कर दिया धीरे-धीरे हल्के में लेना आपकी आदत बन जाएगी और जब कोई बड़ा  अवसर वाला दिन हुआ उसे भी आप अपनी इस आदत के कारण हल्के में ले लोगे और  आपको तब पछतावा होगा जब आपको पता चलेगा कि वह दिन सामान्य दिन के जैसा नहीं था उस दिन  मेरे पास बहुत बड़ा मौका था जिसे मैंने गवा दिया।

आपकी जिंदगी में वह गर्म कंकड़ एक मौका है हर एक  कंकड़ नया दिन है वह गर्म कंकड़ कब आपके हाथ में आएगा वह आपको कभी नहीं पता चलेगा।  लेकिन आपको हर कंकड़ को परखना है हर दुख से सीखना है हर दिन से सीखना है हर व्यक्ति से सीखना है हर परिस्थिति से सीखना है और हर चीज से सीखना है । अचानक कब वह गर्म कंकड़ आपके हाथ में आ जाए जो आपकी पूरी जिंदगी बदल  दे आपकी पूरी जिंदगी सोने की बना दे। यह आपके हाथ में कब आ जाए आप नहीं जानते। आज नहीं तो कल लेकिन जब वह कंकड़ आपके हाथ में आ गया वह आपकी जिंदगी की हर चीज को सोने में बदल देगा। जिंदगी के हर पल को इस तरह से देखो इस तरह से जियो इस तरह से उसमें मेहनत करो जैसे कि वह कंकड़ है जो हर चीज को सोने में बदल देता है।


 मूर्तिकार बाप बेटे की कहानी


एक गांव में एक मूर्तिकार रहा करता था। वह काफी खूबसूरत मूर्तियां बनाया करता था। इन मूर्तियों से काफी अच्छा पैसा कमा लिया करता था। उसे एक बेटा हुआ उसने भी मूर्तियां बनानी शुरू कर  दी बेटा भी बहुत अच्छी मूर्तियां बनाया करता था और बाप   उसकी कामयाबी देखकर बहुत खुश था।

 लेकिन हर बार बेटे की मूर्तियों में कोई ना कोई कमी निकाल दिया करता था।  वह कहता था बहुत अच्छा है लेकिन अगली बार इससे भी अच्छा करने की कोशिश करना। बेटा भी कोई शिकायत नहीं करता था और अपने बाप की सलाह पर अमल करते हुए अपनी कलाकारी और बेहतर करता रहा ।

इस लगातार सुधार की वजह से बेटे की मूर्तियां बाप की मूर्तियों से भी अच्छी बनने लगी और ऐसा टाइम भी आ गया जब बेटे की मूर्तियां बाप की मूर्तियों से बेहतर दामों में बिकने लगी। जबकि बाप की मूर्तियां उसकी पहली वाली कीमत पर ही बिकती रही । बाप अब भी बेटे की मूर्तियों में कमियां निकाल ही देता था।

 बेटे को अब यह अच्छा नहीं लगता था और वह बिना मन के उन कमियों को स्वीकार करता और थोड़ा बहुत सुधार  कर भी देता था। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब बेटे के सब्र ने जवाब दे दिया । एक दिन जब बाप अपने बेटे की मूर्तियों में कमियां निकाल रहा था तब बेटे ने कहा कि अगर आपको इतनी ही समझ होती तो आप की मूर्तियां इतने कम दामों में नहीं बिकती मुझे नहीं लगता कि मुझे आपकी सलाह लेने की जरूरत है मेरी मूर्तियां पर्फेक्ट है।

बाप ने जब बेटे की यह बात सुनी तो उसे सलाह देना और उसकी मूर्तियों में कमी निकालना बंद कर दिया। कुछ  महीने तो वह लड़का खुश रहा फिर उस लड़के ने नोटिस किया कि अब लोग उसकी मूर्तियों की उतनी तारीफ नहीं करते जितनी कि पहले  किया करते थे और उसकी मूर्तियों के दाम बढ़ना भी बंद  हो गए ।

शुरू में तो बेटे को कुछ समझ नहीं आया लेकिन फिर वह अपने बाप के पास गया और अपने बाप को अपनी समस्या के बारे में बताया। बाप ने बेटे को बहुत शांति से सुना जैसे कि उसे पहले से पता था कि 1 दिन ऐसा भी आएगा बेटे ने भी यह नोटिस किया और अपने बाप से पूछा कि आप पहले से जानते थे कि  ऐसा होने वाला है ?

बाप ने कहा हां - मैं भी बहुत साल पहले इस  हालात से टकराया था । तो बेटे ने कहा आपने मुझे समझाया क्यों नहीं? बाप ने जवाब दिया- क्योंकि तुम समझना नहीं चाहते थे । मैं जानता हूं कि तुम्हारे जितनी अच्छी मूर्तियां मैं नहीं बनाता। यह भी हो सकता है कि मूर्तियों के बारे में मेरी सलाह गलत हो और यह भी नहीं है कि मेरी सलाह की वजह से तुम्हारी मूर्तियां बेहतर बनी हो। लेकिन जब मैं तुम्हारी मूर्तियों में कमी निकालता था तो  तुम अपने द्वारा बनाई मूर्तियों से संतुष्ट नहीं होते थे तुम खुद को बेहतर करने की कोशिश  करता था। लेकिन जिस दिन तुमने यह मान लिया कि तुम अपने काम से  संतुष्ट हो गए और अब इसमें और बेहतर करने की गुंजाइश ही नहीं है तुम्हारी  वृद्धि भी  उसी दिन रुक गई ।

लोग हमेशा  तुमसे बेहतर की उम्मीद करते हैं और यही कारण है कि अब तुम्हारी मूर्तियों के लिए तुम्हारी तारीफ नहीं होती। बेटा थोड़ी देर चुप  रहा और फिर सवाल किया कि अब मुझे क्या करना चाहिए ? तो बाप ने एक लाइन में उत्तर दिया -असंतुष्ट होना सीख लो

मान लो कि तुम में हमेशा बेहतर होने की गुंजाइश  बाकी है यही एक बात तुम्हें हमेशा बेहतर होने के लिए प्रेरित करती रहेगी तुम्हें हमेशा बेहतर बनाए  रखेगी।

STAY HUNGRY!

STAY FOOLISH!

Story Writer (Editor): Mukesh Panwar

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