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Tuesday, December 10, 2019

bhoot ki kahani in hindi

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"खंडहर" bhoot ki kahani in hindi  

खंडहर
बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज का स्टूडेंट था| अपने कॉलेज की ओर से हम सभी कैम्प के लिए एक जंगल में गए थे| ,
हलकी ठंढ थी ; अत: रात में हम सबने पूरी रात कैम्प – फायर के साथ डांस करने ,गाने आदि का प्रोग्राम तय किया|
मुझे और सभी साथियों को कैम्प फायर के लिए लकडियाँ इकट्ठी करने का भार सौंपा गया|
मैं निकला तो सबके साथ ही लेकिन जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य में भटकता हुआ अकेले बहुत दूर कहीं निकल गया|
अचानक आसमान बादलों से भर गया और गरज के साथ बारिश होने लगी।  बादलों के लगातार गरजने से मैं पेड़ के नीचे खड़ा रहना मुनासिब न समझ आसपास किसी घर की तलाश में एक दिशा में भागने लगा|
मुझे कुछ ही दूरी पर एक लाल ईंटों से बनी शानदार बिल्डिंग नजर आई।  ,
बिल्डिंग रोशनी से पूरी नहाई हुई थी और उसमें ढेर सारे लोग हैं – ऐसा दूर से ही लग रहा था|
मैं तेजी से भागते हुए उस बिल्डिंग में जा घुसा और सामने से आती हुई एक खुबसूरत नर्स से टकराते – टकराते बचा|
नर्स ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा – “ बहुत अधिक भीग गए हो ,सर्दी लग जायेगी|
उधर बाईं ओर एक स्टोर रूम है ; वहां जाकर जो भी मिले उससे कहना सिस्टर जूलिया ने दुसरे सूखे और साफ़ कपडे मुझे देने को कहा है – वह तुम्हे कपडे दे देगा| “
मैं हक्का – बक्का मुंह फाड़े सिस्टर जूलिया को देखता रहा| मुझे एकदम से यह समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ|मेरी स्थिति देखकर सिस्टर जूलिया खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली –
“पहले तो तुम अपना मुंह बंद करो वरना मुंह में मच्छड घुस जायेंगे और अब जाकर वीसा ही करो जैसा मैं ने कहा है|”
मैं हलके से ‘हाँ ‘ में सर हिला सिस्टर की बताई दिशा में जाने को मुद गया|
अभी कुछेक दस कदम ही चला होउंगा कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा|
मैं चौंककर पीछे मुदा और अपने सामने आर्मी की वर्दी में एक युवक को खडा मुस्कुराता पाया| मेरे चेहरे पर आश्चर्य का बादल अपना घर बना चुका था ; जिसे देखते ही उस युवक को हंसी आ गई|
उसने धीमे ,किन्तु दृढ स्वर में कहा – “ मैं कैप्टन विनोद हूँ और यह हमारे देश की आर्मी का हॉस्पिटल है|’
कैप्टन विनोद की बातों ने मुझे आश्वस्त किया|
मैं अब धीरे – धीरे सामान्य हो गया और मैं ने कैप्टन विनोद को सिस्टर जूलिया की कही बातें बताई|
सुनकर ,कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फ़ैल गई और वे बोले – “ तो सिसितर जूलिया से भी मिल चुके|”
“ जी , क्या मतलब है आपका ?”
“ कुछ नहीं ,चलो मैं तुम्हे सूखे कपडे देता हूँ चेंज कर लो नहीं तो सच में सर्दी लग जायेगी|”
और मैं कैप्टन विनोद के पीछे – पीछे एक बड़े से कमरे में पहुँच गया| कमरे के चारो ओर हरे रंग के परदे लगे हुए थे| ,
 एक ओर एक बड़ा सा बेड पडा हुआ था और उसके सामने एक सोफा था|
बीच में एक टेबल था जिस पर दो ग्लास ,एक बड़ी बोतल ब्रांडी की और एक या दो पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं|
कमरे के एक कोने में एक बड़ी सी अलमारी थी ;जिसमें से कैप्टन विनोद ने एक आसमानी रंग का कुरता – पायजामा निकालकर मुझे दिया और कमरे से लगे बाथरूम की ओर इशारा किया|
मैं बाथरूम से कपडे चेंज कर जैसे ही निकलने लगा मेरी नजर बाथरूम की एक दीवाल पर पड़ी|
वह खून के छींटों से भारी हुई थी| यह देखकर मैं घबडा गया और जल्दी से बाहर निकलने को मुदा कि बाथरूम में लगे आईने में खुद को ही देखकर चौंक गया|
आईने में मेरा पूरा शरीर तो नजर आ रहा था लेकिन मेरे शरीर पर से मेरा सर गायब था|
अब मुझे डर लगने लगा और मैं हडबडा कर बाथरूम से निकल गया| ,
मुझे इस तरह बाहर निकलते देख कैप्टन विनोद ने हंसकर पूछा – “ क्या हुआ ? अरे हाँ ,तुम ने तो अब तक मुझे अपना नाम ही नहीं बताया|”
“ कहाँ जाओगे ,बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है| लेकिन ,तुम जाना क्यों चाहने लगे अचानक यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ|”
“ कैप्टन विनोद आपकी बाथरूम की एक दीवाल पूरी खून के छींटों से भरी हुई है| और और आपके बाथरूम में लगा आईना भी कुछ अजीब सा है|
उसमें मुझे मेरा पूरा शरीर तो दिखाई दिया लेकिन मेरा सर ही गायब था| मैं अब बिलकुल भी नहीं रुकुंगा यहाँ|
बारिश में ही भीगता हुआ अपने कैम्प तक जाऊँगा|” कहते हुए मैं कमरे से बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ा|
“ रुको “ तभी कैप्टन विनोद की कडकती आवाज गूंजी “ तो तुमने सबकुछ देख ही लिया|”
“जी क्या मतलब है आपका ?” मेरी आवाज में डर भर गया था|
“ मतलब चाहे जो हो|तुम तब तक यहाँ से नहीं जा सकते जबतक मैं तुम्हे कुछ बता न दूं|”
“ क्क्कक्या बताना चाहते हैं आप ?”
“ जो आजतक कोई न जान सका|” “ जो आज तक कोई न जान सका वह मैं जानकार क्या करूंगा| प्लीज ,अब मुझे जाने दें|” – मैं डर से रुआंसा हो गया|
“नहीं , बिलकुल भी नहीं| और , तुम्हे मुझसे डरने की भी कोई जरुरत नहीं|
सैनिक सबकी रक्षा के लिए होते हैं| मैं भी तुम्हारी सुरक्षा ही कर रहा हूँ|” - कैप्टन विनोद के स्वर में कोमलता थी – “ आओ मेरे साथ इस सोफे पर बैठ जाओ|
मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ| कहानी खत्म होते ही मैं तुम्हे तुम्हारे कैम्प तक जीप से छोड़ आऊंगा|
वैसे भी तुम अपने साथियों से काफी आगे निकल आये हो|वहां तक तुम अब चलते हुए शायद पहुँच न पाओ|”
कैप्टन विनोद के स्वर में जाने कैसी आश्वस्ति थी मैं जाकर उनके बगल में बैठ गया|
कैप्टन विनोद ने कहना शुरू किया – “दुश्मनों ने धोखे से हमारे अस्पताल को अपना निशाना बनाया|
दुश्मन देश के दो सैनिक हमारे सैनिक के वेश में एक हमारे ही घायल सैनिक को लेकर आये|
वह घायल था और और हमारे देश की सेना ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला था|
शायद , साजिश के तहत उसे घायल होते ही घुसपैठियों ने कहीं छुपा दिया था|
अचानक अपने खोये सैनिक को अपने हॉस्पिटल में पा सभी खुश हो गए और बिना अधिक पड़ताल किये हॉस्पिटल के गेस्ट रूम में घायल को लेकर आने वाले छद्म वेष धारियों को ठहरने की इजाजत दे दी गई|
अभी उस सैनिक का इलाज चल ही रहा था कि जोरों का ब्लास्ट हुआ और पूरा हॉस्पिटल एक पल में खंडहर में तब्दील हो गया|”
“ लेकिन हॉस्पिटल तो अपनी शानदार स्थिति में खडा है| “
मेरी बातों को अनसुना कर कैप्टन विनोद ने अपनी बात जारी रखी – “ कोई नहीं बचा उस ब्लास्ट में|
दीवाल पर पड़े खून के छींटे भी उसी ब्लास्ट में मारे गए होपितल के कर्मचारियों के हैं|”
“ हाँ , पर यह होस्पीटल तो मुझे खंडहर नहीं दिखता|”
जवाब में कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कान फ़ैल गई और उनका चेरा अजीब से भावों से भर गया|
मैं उनके चेहरे को देखकर अन्दर से दहल गया| फिर भी , मैं ने हिम्मत कर पूछा – “ आप उस ब्लास्ट में बाख कैसे गए ?”
सुनते ही कैप्टन विनोद ठहाका लगा कर हंस पड़े और मुझ पर एक भरपूर नजर डालते हुए कहा – “ यह कहानी आज से मात्र दस वर्ष पहले की है और मैं तो आज से पचास वर्ष पहले मर चुका हूँ|”
 इसके आगे उनहोंने क्या कहा – मुझे कुछ नहीं मालुम|,
चेहरे पर गीलेपन का अहसास जब काफी हुआ तो मैं जैसे नींद से जागा| मुझे घेरे हुए मेरे सभी सहपाठी और टीचर खड़े थे|
मेरे आँख खोलते ही मेरे सर ने कहा – “ थैंक गॉड ! तुम्हे होश आ गया|”
“ तो क्या मैं बेहोश था ?”
“ हाँ , तुन जंगल में जाने कहाँ भटक गए थे|
जब सभी लौट आये और तुम नहीं आये तो हम सभी मिलकर तुम्हें ढूँढने निकले|
काफी दूर जाने के बाद हमने एक जीप आती दिखाई दी जिसमें एक आर्मी मैन तुम्हे पीछे की सीट पर सुलाए हुए हमारे कैम्प को ढूंढते हुए आ रहे थे|
उनहोंने हम सबको भी अपनी जीप पर बिठाया और कैम्प तक्ल छोड़ा|
हमने उन्हें काफी रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कहते हुए चले गए अभी नहीं रुक सकता एक जरुरी काम है|”
जब हमने तुम्हारे बेहोश जाने और उन तक तुम्हारे पहुँचने के बारे में पूछा तो बोले – “ सोमेश ही बताएगा और जो भी बताएगा वह सब अक्षरश: सच होगा|
सबकी उत्सुक निगाहें अपनी ओर लगी देख मैं ने धीमे स्वर में पूछा -- + क्या उनका नाम कैप्टन विनोद था ?”
सर ने “ हाँ “ में सर हिलाया| मैं ने सबको उधर चलने को कहा जिधर से सबने जीप आती देखी थी। 
पहले तो सर तैयार नहीं हुए लेकिन मेरे बहुत कहने पर वे राजी हो गए| सुबह होते ही हम उधर की ओर गए|
मैं उस जगह पर पहुँच कर गहरे आश्चर्य में डूब गया| वहां एक अधजला खंडहर था : जिसके एक टूटे पत्थर पर लिखा था “ आर्मी हॉस्पिटल “ ,


"अच्छा भूत" bhoot ki kahani in hindi  

"अच्छा भूत"
अच्छा भूत, कुफरी में स्कीइंग का लुफ्त उठाने और पूरा दिन मौज मस्ती करने के पश्चात कुमार, कामना, प्रशान्त और पायल शाम को शिमला की ओर बीएमडब्लू में जा रहे थे।,
सर्दियों के दिन, जनवरी का महीना, शाम के छ: बजे ही गहरी रात हो गई थी।
गोल घुमावदार रास्तों में अंधकार को चीरती, पेडों के झुरमुठ के बीच कार चलती जा रही थी।
सैलानी ही इस समय सडकों पर कार चलाते नजर आ रहे थे। टूरिस्ट टैक्सियां भी वापिस शिमला जा रही थी।
कुफरी की ओर इक्का दुक्का कारें ही जा रही थी। बातों के बीच चारों शिमला की ओर बढ रहे थे। लगभग आधा सफर कट गया था
कार स्टीरियो की तेज आवाज में हंसी ठिठोली करते हुए सफर का आनन्द उठाते हुए समय का पता नही चल रहा था। झटके मारते हुए कार क्यों चला रहे हो?” प्रशान्त ने झटकती हुई कार में झूलते हुए कुमार से पूछा।
“प्रशान्त भाई, मैं तो कार ठीक चला रहा हूं, मालूम नही, यह अचानक से झटके क्यों खा रही है?” कुमार ने झटके खाती कार को संभालते हुए कहा।
“कार को थोडा साईड करके देख लेते हैं। “हो सकता है, कि डीजल में कचरा आ गया हो, थोडी रेस दे कर देखता हूं, कि कार रिदम में आ जाए।
“ कुमार ने क्लच दबाते हुए कार का ऐक्सीलेटर दबाया, लेकिन कोई खास कामयाबी नही मिली, कार झटके खाती हुई रूक गई।
“अब क्या करे?” चारों के मुख से एक साथ निकला। सभी सोचने लगे, कि काली रात के साए में कुछ भी नजर नही आ रहा था, सोने पे सुहागा तो धुन्ध ने कर दी थी। धीरे धीरे धुन्ध बढ रही थी। ठंडक भी धीमे धीमे बढ रही थी। कार सडक की एक साईड पर खडी थी।
इक्का दुक्का कार, टैक्सी आ जा रही थी। “प्रशान्त बाहर निकल कर मदद मांगनी पडेगी। कार में बैठे रहने से कुछ नही होगा।
कार तो हम चारों का चलाना आता है, लेकिन कार के मैकेनिक गिरी में चारों फेल है। शायद कोई कार या टैक्सी से कोई मदद मिल जाए।
“ कह कर कुमार कार से बाहर निकला। एक ठंडे हवा के तेज झोके ने स्वागत किया। शरीर में झुरझरी सी फैल गई।
प्रशान्त भी कार से बाहर निकला। पायल और कामना कार के अंदर बैठे रहे। ठंड बहुत अधिक थी दिल्ली निवासियों कुमार और प्रशान्त की झुरझरी निकल रही थी। दोनों की हालात दयनीय होने लगी।
“थोडी देर खडे रहे तो हमारी कुल्फी बन जाएगी।“ कुमार ने प्रशान्त से कहा।
“ठीक कह रहे हो, लेकिन कर भी क्या सकते है।“ प्रशान्त ने जैकेट की टोपी को ठीक करते हुए कहा।
“लिफ्ट मांग कर शिमला चलते है, कार को यहीं छोडते है। सुबह शिमला से मैकेनिक ले आएगें।“ कुमार ने सलाह दी।
“ठीक कहते हो।“ रात का समय था। गाडियों की आवाजाही नगण्य थी। काफी देर बाद एक कार आई। उनको कार के बारे में कुछ नही मालूम था, वैसे भी कार में पांच सवारियां थी। कोई मदद नही मिली।
दो तीन कारे और आई, लेकिन सभी में पूरी सवारियां थी, कोई लिफ्ट न दे सका। एक टैक्सी रूकी।
ड्राईवर ने कहा, जनाब मारूती, होंडा, टोएटा की कार होती तो देख लेता, यह तो बीएलडब्लू है, मेरे बस की बात नही है।
एक काम कर सकते हो, टैक्सी में एक सीट खाली है, पति, पत्नी कुफरी से लौट कर शिमला जा रहे हैं। उनसे पूछ तो, तो एक बैठ कर शिमला तक पहुंच जाऔगे। वहां से मैकेनिक लेकर ठीक करवा सकतो हो। टैक्सी में बैठे पति, पत्नी ने इजाजत दे दी।
कुमार टैक्सी में बैठ कर शिमला की ओर रवाना हुआ। प्रशान्त कार में बैठ गया। प्रशान्त पायल और कामना बातें करते हे समय व्यतीत कर रहे थे।
धुन्ध बढती जा रही थी। थोडी देर बाद प्रशान्त पेशाब करने के लिए कार से उतरा। कामना, पायल कार में बैठे बोर हो गई थी।,
मौसम का लुत्फ उठाने के लिए दोनों बाहर कार से उतरी। कपकपाने वाली ठंड थी।
“कार में बैठो। बहुत ठंड है। कुल्फी जम जाएगी।“ प्रशान्त ने दोनों से कहा। “बस दो मिन्ट मौसम का लुत्फ लेने दो, फिर कार में बैठते हैं।“ पायल और कामना ने प्रशान्त को कहा। “भूतिया माहौल है। कार में बैठते है।“ प्रशान्त ने कहा।
प्रशान्त की बात सुन कर पायल खिलखिला कर हंस दी। “भूतिया माहौल नही, मुझे तो फिल्मी माहौल लग रहा है।
किसी भी फिल्म की शूटिंग के लिए परफेक्ट लोकेशन है। काली अंधेरी रात, धुन्ध के साथ सुनसान पहाडी सडक।
हीरो, हीरोइन का रोमांटिक मूड, सेनसुएस सौंग। कौन सा गीत याद आ रहा है।“ “तुम दोनों गाऔ। मेरा रोमांटिक पार्टनर तो मैकेनिक लेने गया है।“ कामना ने ठंडी आह भर कर कहा।

तीनों हंस पडे। तीनों अपनी बातों में मस्त थे। उनको मालूम ही नही पडा, कि कोई उन के पास आया है।

एक शख्स जिसने केवल टीशर्ट, पैंट पहनी हुई थी, प्रशान्त के पास आ कर बोला “आपके पास क्या माचिस है?”
इतना सुन कर तीनों चौंक गए। जहां तीनों ठंड में कांप रहे थे, वही वह शख्स केवल टीशर्ट और पैंट पहने खडा था, कोई ठंड नही लग रही थी उसे।
प्रशान्त ने उसे ऊपर से नीचे तक गौर से देख कर कहा। “आपको ठंड नही लग रही क्या?”
उसने प्रशान्त के इस प्रश्न का कोई उत्तर नही दिया बल्कि बात करने लगा “आप भूतिया माहौल की अभी बातें कर रहे थे।
क्या आप भूतों में विश्वास करते हैं? क्या आपने कभी भूत देखा है?” “नही, दिल्ली में रहते है, न तो कभी देखा है और न कभी विश्वास किया है, भूतों पर।“ प्रशान्त ने कह कर पूछा, “क्या आप विश्वास करते है?“
“हम पहाडी आदमी है, हर पहाडी भूतों को मानता है। उन का अस्तित्व होता है।“
उस शख्स की भूतों की बाते सुन कर कामना और पायल से रहा नही गया। उनकी उत्सुक्ता बढ गई।,
“भाई, कुछ बताऔ, भूतों के बारे में। फिल्मी माहौल हो रखा है, कुछ बात बताऔ।“,

उस शख्स ने कहा “देखिए, हम तो मानते है। आप जैसा कह रहे हैं, कि शहरों में भूत नजर नही आते, हो सकता है, नजर नहीं आते होगें
मगर पहाडों में तो हम अक्सर देखते रहते है। “कहां से आते है भूत और कैसे होते हैं, कैसे नजर आते है।“ प्रशान्त ने पूछा।
उस शख्स के हाथ में सिगरेट थी, वह सिगरेट को हाथों में घुमाता हुआ बोला “भूत हमारे आपके जैसे ही होते हैं। वे रौशनी में नजर नही आते है।“
“होते कौन है भूत, कैसे बनते है?“ पायल ने पूछा। “यहां पहाडों के लोगों का मानना है, कि जो अकस्मास किसी दुर्घटना में मौत के शिकार होते है
या फिर जिनका कत्ल कर दिया जाता है, वे भूत बनते है।“ उस शख्स ने कहा। “क्या वे किसो को नुकसान पहुंचाते है, मारपीट करते हैं?” प्रशान्त ने पूछा।
“अच्छे भूत किसी को कुछ नुकसान पहुंचाते है। अच्छा मैं चलता हूं। सिगरेट मेरे पास है। आप के पास माचिस है, तो दीजिए, सिगरेट सुलगा लेता हूं।
“ उस शख्स ने कहा। प्रशान्त ने लाईटर निकाल कर जलाया। उस शख्स ने सिगरेट सुलगाई। लाईटर की रौशनी में सिर्फ सिगरेट नजर आई
वह शख्स गायब हो गया। लाईटर बंद होते ही वह शख्स नजर आया। तीनों के मुख से एक साथ निकला – भूत।

तीनों, प्रशान्त, पायल और कामना का शरीर अकड गया और बेसुध होकर एक दूसरे पर गिर पडे।
अकडा शरीर, खुली आंखें लगभग मृत्य देह के सामान तीनों मूर्क्षित थे। वह शख्स कुछ दूरी पर खडा सिगरेट पी रहा था।
तभी वहां आर्मी का ट्रक गुजरा। उसने ट्रक को रूकने का ईशारा किया। ट्रक ड्राईवर उसे देख कर समझ गया, कि वह कौन है।,
ट्रक से आर्मी के जवान उतरे और तीनों को ट्रक पर डाला और शिमला के अस्पताल में भरती कराया।

कुछ देर बाद कुमार कार मैकेनिक के साथ एक टैक्सी में आया। अकेली कार को देख परेशान हो गया, कि तीनों कहां गये।
वह शख्स, जो कुछ दूरी पर था, कुमार को बताया, कि ठंड में तीनों की तबीयत खराब हो गई, आर्मी के जवान उन्हें अस्पातल ले गये हैं।,
कह कर वह शख्स विपरीत दिशा की ओर चल दिया। मैकेनिक ने कार ठीक की और कुछ देर बाद शिमला की ओर रवाना हुए।
कुमार सीधा अस्पताल गया। डाक्टर से बात की। डाक्टर ने कहा कि तीनों को सदमा लगा है। वैसे घबराने की कोई आवश्कता नही है
लेकिन सदमें से उभरने में समय लगेगा। कुमार को कुछ समझ नही आया, कि उन्होनें क्या देखा, कि इतने सदमे में आ गए।
अगली सुबह आर्मी ऑफिसर अस्पताल में तीनों को देखने आया। कुमार से कहा – “आई एम कर्नल अरोडा, मेरी यूनिट ने इन तीनों को अस्पातल एडमिट कराया था।“
कुमार ने पूछा – “मुझे कुछ समझ में नही आ रहा, कि अचानक से क्या हो गया?“

कर्नल अरोडा ने कुमार को रात की बात विस्तार से बताई, कि वह शख्स भूत था, जिसे देख कर तीनों सदमें में चले गए और बेसुध हो गए।
वह एक अच्छा भूत था। अच्छे भूत किसी का नुकसान नही करते। उसने तीनों की मदद की। हमारे ट्रक को रोका और कुमार के वापिस आने तक भी रूका रहा।
शाम तक तीनों को होश आ गया। दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली और सभी दिल्ली वापिस गए, लेकिन सदमें से उभरने में लगभग तीन महीने लग गए।
आज सात साल बीत गए उस घटना को। चारों कभी भी घूमने रात को नही निकलते। नाईट लाईफ बंद कर दी।


घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, बस यही रूटीन है उन का। उस घटना को याद करके आज भी उनका बदन ठंडा होने लगता है।


"तंत्रा" bhoot ki kahani in hindi 

"तंत्रा"
 मुकेश और मैं एक ही कंपनी में काम किया करते थे। एक रोज हमें ट्रेनिंग पर भेज दिया गया। हमारी इससे पहले औपचारिक बातें ही हुआ करती थी।
पर ट्रेनिंग पर हमें एक दूसरे को जानने का मौका मिला। हमें कमरे में एक साथ ही रूकना था। साथ रहकर हम आपस में काफी घुल मिल गए थे। ,
अक्सर रात को मुझ पर से चादर हट जाती तो मुकेश मुझे चादर ओढ़ा दिया करता था। मैंने उससे पूछा,’’क्यो जागते रहते हो रात भर।
मेरी तो आदत है करवट बदल-बदल कर सोने की चादर तो टिकती ही नहीं‘‘।
मुकेश ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। अगले दिन वो कुछ शांत नजर आने लगा।
रात को सोते समय मुकेश ने जो मुझे बताया वो न केवल दिलचस्प था बल्कि कुछ ऐसा था जो मैंने ना तो कभी सुना ना ही कभी महसूस किया।
ऐसा कम ही देखने को मिलता है। बात केवल विश्वास की रह जाती है।                            मुकेश ने कहना शुरू किया।
आप शायद यकीन ना करें 2003 का साल था। टीवी देखना, लाइब्रेरी जाना, दोस्तों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या बनी हुई थी।
ऐसे में एक दिन मैं अपने दोस्त से मिलने उसके घर गया हुआ था। पता चला मेरे छोटे भाई दिनेश की तबियत खराब है।
मैं तुरंत घर को निकल पड़ा। वहॉँ देखा परिवार के सभी लोग मौजूद हैं। दिनेश जोरों से चींख रहा है, जैसे उसे किसी तरह का दर्द हो रहा हो।
उसकी हालत बिल्कुल भी देखने लायक नहीं थी। तीन चार लोग भी मिलकर उसे संभाल नहीं पा रहे थे।
पिताजी ने कहा इसे तुरंत डॉक्टर के पास ले चलते हैं। पर माँ ने मुझे चुप रहने का इशारा किया। दिनेश चींखता और बेहोश हो जाता।
           
           दिनेश की चीखें अब भयानक होने लगी थी। कोई उसका सर दबा रहा था कोई उसकी छाती मल रहा था।



नानी ने कहा इसे पूजाघर में ले चलो। इतना सुनते ही दिनेश जोरों से चीखा। शायद ये बात उसे पसंद नहीं आयी।
उसे घसीट कर पूजाघर में लाना पड़ा। यहॉँ वो और भी जोरों से चीखने लगा। उसे संभालना मुश्किल हो रहा था तो हमने उसे कुर्सी से बांध दिया। ,
फिर नानी ने उससे प्रश्न किया, ‘‘बता कौन है तू’’?
सुनकर दिनेश गुस्से में भर गया। उसका सर और छाती अब भटटी की तरह तपने लगे। उसे अब संभालना मुश्किल हो रहा था। नानी ने फिर कहा, ’’बता कौन है तू‘‘?
इस बार दिनेश ने गुस्से में अपने दांत पीस लिए। उन दांतों को किटकिटाने की आवाज मेरे कानों में दर्द करने लगी थी।
उसके बदन की सारी हडिडयॉ कड़क रही थी। , आखिर में उसने अपनी जबान बाहर निकाली जो काली पड़ चुकी थी। यकीन नहीं हो रहा था किसी इंसान की जबान खिंच कर इतनी लंबी हो सकती है।
नानी ने फिर अपनी बात को दोहराया ’’बता कौन है तू‘‘? कहॉ से आया है ?
इस बच्चे ने तेरा क्या बिगाड़ा है? जहाँ से भी तुम आये हो वहीं लौट जाओ। बदले में जो कुछ भी मांगोगे हम तुम्हें देंगे। लेकिन इस बच्चे को छोड़ दो‘‘।
दिनेश ने अपना आपा खो दिया। वो उसी तरह कराहता, दांत पीसता, चींखता चिल्लाता और बेहोश हो जाता।
होश में आने पर उसे संभालना मुश्किल हो जाता था। मुझसे यह सब देखा नहीं गया। मैं बाहर आ गया और रोने लगा।

उस वक्त मैंने हनुमानजी को याद किया। मंदिर में दिया भी जलाया। रोते-रोते भगवान से दिनेश के ठीक होने की प्रार्थना की।

और वापस दिनेश के पास आ गया। दिनेश के रोने-चीखने से वहॉ अब जमघट लग चुका था। लोगो की भीड़ में भी दिनेश उसी तरह की हरकतें किये जा रहा था।
उसके शांत होने पर मैंने उसे पानी पिलाया। पानी पीने के बाद वो और भी भयानक रूप में आ गया।
उसका चेहरा एक दम काला हो गया, आंँखे लाल सुर्ख हो गई। यह वो दिनेश नहीं था जिसे मैं पहचानता था। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आंँखे फट कर बाहर आ जायेगी। ,
पास जाने पर वो हर किसी को काटने को दौड़ता। अपना मुँह नोचने लगता। और फिर वो शांत हो गया और रोने लगा।
मैंने पूछा तुम कौन हो? क्यों हमें परेशान कर रहे हो?
दिनेश ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मेरी जान ले लेगा। दिनेश कुछ देर तक मुझे घूरता रहा। वो दिनेश नहीं था उसकी जगह किसी और ने ले ली थी।
सबको बारी बारी घूरने के बाद उसकी आँखें अपने कोटर में गोल गोल घूमने लगी।
ऐसा नजारा जीवन में पहली बार ही देख रहा था। बल्कि मैं तो कहूंगा यह सब कुछ जीवन में पहली बार ही देख रहा था।
वो चींखना चिल्लाना वो भयानक सी हँंसी, वो दांत पीसना किटकिटाना, दर्द में कराहना, हडिडयों का एक साथ कड़कना, सब कुछ एक मनहूसियत में बदल चुका था।
फिर दिनेश ने एक लंबी सांस खींची और छोड़ी। उसकी सांस की दुर्गन्ध इतनी थी सब अपना मुंह ढ़क कर घर से बाहर निकल गए। और वो पागलों की तरह हंँसा। वापस अंदर जाने पर दिनेश फिर सभी को घूरने लगा। हमने वापस उससे पूछा, ’’कौन हो तुम‘‘?
फिर वो एक औरत की आवाज में बोला, ‘‘मैं शाहडोल की हूॅ। मैं हूँ तंत्रा। इसने मुझे जगा दिया है। मैं इसे नहीं छोडूंगी। इसे अपने साथ लेकर जाउंगी’’। और हंसने लगी।
हमने कहा जो तुम मांगोगी हम तुम्हें देंगें पर इसे छोड़ दो।
वो दुष्ट आत्मा अब अपने पूरे रूप में आ गई और बोली, ‘‘मुझे एक मटकी, चार नारियल, चुनरी, सिंगार का पूरा सामान लाकर दो तो मैं चली जाउँगी।
नहीं तो इसे अपने साथ ही लेकर जाउँगी।
जल्दी करो। जल्दी करो दफा हो जाओ। ये सामान लेकर ही आना। वरना इसे तो मैं चबा जाउंगी’’। और हंसने लगी
हम सबके चेहरे पीले पड़ गये। माँ और मैं तेजी से बाजार की तरफ निकले। रास्ते में मॉ रोने लगी तो मैंने उन्हें दिलासा दी ‘‘सब ठीक हो जाएगा’’ माँ
माँ बोली कुछ भी ठीक नहीं होने वाला मुकेश। मैंने तुझे बताया नहीं। इसने जब अपना पहला असर दिखाया था। तब दिनेश को क्या हुआ हम समझ ही नहीं पाये थे।
दिनेश के साथियों ने हमें बताया। उस दिन दिनेश के ऑफिस में मीटिंग थी। सब आपस में हंस-बोल रहे थे।
सब कुछ ठीक था कि अचानक दिनेश की तबियत बिगड़ने लगी। दिनेश ने सामने रखा गिलास उठाया और पानी पिया। पानी पीते ही दिनेश बेहोश हो गया।
उसके साथी चौंक गये। दो लोगों ने मिलकर उसे टेबल पर लिटाया। उस समय उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
वो अपनी साथियों से कुछ कहना चाह रहा था लेकिन उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था। उसके साथी उसे हॉस्पिटल ले गए।
हमें जैसे ही सूचना मिली हम सभी वहॉ पहुंच गए। दिनेश कुछ देर बाद दिनेश ठीक हो गया। क्या हुआ उसे खुद भी कुछ मालूम नहीं था।
उसे इतना याद था कि वो बेहोश हो गया था। उसके बाद कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे कोई परेशानी हो।
‘‘तुम ठीक कह रही हो मॉ उसके बाद भी कुछ हुआ जरूर था’’ क्या मतलब? मॉ बोली।
मतलब ये माँ पिछली बार जब मैं छुटिटयों में घर आया था। उस रात मैं कमरे में सो रहा था।

रात के तीन बजे का समय था। कमरे की खिड़की खुली हुई थी और उससे तेज हवा कमरे में आ रही थी।

उस हवा के शोर से मेरी आंँख खुली। मैंने देखा एक साया मेरे पास खड़ा था। ध्यान से देखने पर भी मैं उसका चेहरा ना देख पाया।
उसके चेहरे पर कालिख के आलावा कुछ ना था। उसका शरीर धुँंए जैसा था। अचानक वो सांया बादल की तरह तैरता मेरे पास आने लगा।
मैं घबरा गया और अपनी चादर में मैंने अपने आप को समेट लिया। वापस देखा तो वो साया वहाँ नहीं था।
इसे अपना वहम मानकर मैं भूल चुका था। पर अब दिनेश के हालात देख कर लगता है कुछ तो जरूर हुआ है मॉँ।
इसके बाद मैं मटकी लेने चला गया और माँं सिंगार के लिए सामान खरीदने लगी। मुझे दुकाने बंद मिली तो मैं सीधे कुम्हार के घर चला गया।
वहॉ से लाल और काली दोनों मटकी ले आया। वापस आकर ज्यों ही सामान हमने दिनेश के आगे रखा वो शांत हो गया।
नानी उसे देखने गई और दिनेश के सामने जाकर खड़ी हो गई। कुछ देर तक नानी उसे ऐसे ही देखती रही तो हमने नानी से पूछा क्या हुआ नानी? नानी हमारी ओर पलटी।
अब नानी के चेहरे के भाव दिनेश जैसे हो गए थे। हम और भी घबरा गये। नानी ने भी उसी चींख के साथ रोना शुरू कर दिया और कहा, ‘‘ मैं शाहडोल की हूॅ। मेरी हत्या कर दी गई थी।
मेरी लाश के बेरहमी से टुकडे़ टुकडे़ करके दफन कर दिया गया। मुझे इंसाफ चाहिए।
मुझे जहॉ गाड़ा गया वहॉ ये लड़का पेशाब कर आया। मैं सोई हुई थी इसने मेरा अपमान किया और मुझे जगा दिया। पर अब मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं जा रही हॅू। मुझे रास्ता दो।
हमने पूछा तुम इसे दोबारा परेशान नहीं करोगी। वो बोली नहीं इसने मेरा अपमान किया जिसकी सजा मैंने दे दी। अब मुझे जाने दो।
और नानी बेहोश होकर गिर गई। हमने नानी को संभाला। इतनी देर में दिनेश भी सामान्य हो चुका था। हमने दिनेश को भी कुर्सी से खोल दिया।
फिर कुछ दिन और बीते दिनेश को काम के लिए भोपाल जाना पड़ा। दिनेश और ऑफिस के कुछ लोगा होटल में रूके। ,
होटल में आधी रात को लोगो ने शिकायत की वहॉ कमने से रोने की आवाजें आ रही हैं। होटल कर्मी ने जाकर देखा तो वो आवाजें दिनेश के कमरे से आ रही थी।
कमरा अंदर से बंद था। तो होटल कर्मी ने दूसरी चाबी से कमरे का दरवाजा खोला।, सामने दिनेश था होटल की चादर में पूरा लिपटा हुआ और जमीन से दो फुट उपर हवा में उसका शरीर तैर रहा था।
उसके मुंह से अजीब अजीब आवाजें आ रही थी। इस भयानक नजारे को देख कर उन लोगों के दिल दहल गये। कुछ लोग तो भाग खडे हुए। ,
बाकी लोगो ने दिनेश को पकड़ा तो वो चींख पड़ा और चिल्लाने लगा। लोगों ने पुलिस को फोन कर दिया।
शांतिभंग के आरोप में पुलिस दिनेश को ले गई। उसके साथियों ने उसे छुड़ाया।
उसके बाद दिनेश का लगातार यही हाल रहा। किसी ने मांडल के जंगलों में एक तांत्रिक होने की बात हमें बताई। शायद वो दिनेश को ठीक कर सके।
हमने उसे बुलाया। उस तांत्रिक ने भी आत्मा से बातें की तो उसकी वही मांग शुरू हो गई। मटकी, चार नारियल, चुनरी और सिंगार का सामान।
अभी तक याद है मुझे वो किस तरह अपनी मांगे दोहराती थी। इन सबके साथ उसने शराब भी मांगी।
रात के समय शराब कहीं भी नहीं मिली। मैं भागा भागा अपने मौहल्ले की उन गलियों में गया जहॉ से मुझे गुजरना भी गंवारा नहीं था।
पर भाई की सलामती के लिए भी उन गलियों में गया जहॉ अक्सर लोग नशे में धुत्त पडे़ रहते थे। शराब की दुर्गंध के कारण दिन में भी उस गली से कोई नहीं गुजरता था।
वहॉ जाकर मैंने उन लोगों से शराब मांगी तो उन्होंने कहा क्या आज तू भी पियेगा आजा आजा बैठ यहॉ आज तू बेटा सारे गम भूल जायेगा।
मैं गम भुलाने नहीं आया हूॅ। मेरे भाई की तबियत खराब है उस पर उपरी साया है।
 तांत्रिक शराब से पूजा करेगा। यह सब जानने के बाद उन्होंने अपनी शराब की बोतल मुझे दे दी। जिसे लेकर मैं लौट आया। इसके बाद शराबियों से मेरी नफरत कम हो गई।
तांत्रिक ने पूजा शुरू की। रात भर तांत्रिक पूजा करता रहा। दिनेश कभी चींखता, कभी चिल्लाता, कभी दर्द में कराहता, कभी गुस्से में तांत्रिक को गालियां देता, कभी मुझे घूरता, कभी तांत्रिक को घूरता। , तांत्रिक का उस पर कोई ध्यान नहीं था। वो एक दाना गेंहूॅ का लेता कुछ मंत्र पढता और उस दाने को दिनेश पर फेंक देता।
उस दाने के शरीर पर पड़ते ही दिनेश बुरी तरह तड़पने लगता।
उसके मुंह से जानवरों के जैसे गुर्रराने की आवाजें निकल रही थी। वो जानवरों की तरह हरकत करने लगा था।
दिनेश की आवाज उसके गले में ही बंध कर रह गई थी । वो क्या बोल रहा था कुछ समझ नहीं आ रहा था।
सुबह तक दिनेश ठीक हो गया और बेहोश रहा। शायद इन सबसे उसका शरीर थकने लगा था। उसका चेहरा पीला पड़ने लगा था।
शरीर सूख कर लकड़ी जैसा हो चला था। फिर भी कहीं ना कहीं मेरा भाई इन बुरी शक्तियों से लड़ रहा था मुझे यकीन था।

कुछ दिन और बीतने पर दिवाली को त्यौहार आ गया था। धनतेरस का दिन था और मैं टीवी देख रहा था।

दिनेश कमरे में आया और बेहोश हो गया। मुझे लगा वापिस वही सब शुरू होने वाला है तो मैंने उसे कुर्सी से बांध दिया।
दिनेश थोड़ा होश में आया और उस आधी बेहोशी की हालता में उसने मुझसे कहा, भाई अब मैं नहीं बचूंगा, मैं खत्म हो जाउंगा।
ये सुन कर मेरी आंखों से आंँसू आ गये। मैं अपने भाई को इस तरह जिंदगी से हारते नहीं देखना चाहता था। दिनेश भी रो रहा था ’’भाई मैं मर जाउगा‘‘। मैने खुद को संभाला और दिनेश को बाँध दिया। बाइक ली और एक दोस्त को साथ लेकर मै उसी तांत्रिक को बुलाने निकला।
मांडल के घनघोर जंगल घुप्प अंधेरा। मैं तांत्रिक के घर पहुॅँचा। तांत्रिक भी उस दिन शराब के नशे में था। उसे बाइक पर बीच में बैठा कर ले आये।
तांत्रिक का खुद का शरीर बस में नहीं था। गिरता-पड़ता वो दिनेश के पास पहुॅँचा।
  जैसे ही उसने दिनेश का हाथ पकड़ा उस तांत्रिक का सारा नशा उतर गया। उसने वही पूजा दोहराई और सुबह होने तक दिनेश फिर ठीक हो गया।
अब तो यही सिलसिला चालू हो गया था। तांत्रिक आता पूजा करता और सुबह तक चला जाता। मटकी, चार नारियल, चुनरी और सिंगार का सामान हमारी रोज की जरूरत बन गयी।
ये सब चीजें अब घर में हर समय मौजूद रहने लगी। रोज रात घिरते घर में मनहूसियत-सी छा जाती। घर के एक कोने में शराब की बोतलों का ढेर इक्ट्ठा हो गया था।
ऐसा कोई मंदिर नहीं बचा, कोई मस्जिद नहीं बची जहाँ दिनेश का इलाज नहीं करवाया। अंत में किसी ने कलकत्ता के काली मंदिर जाने का सुझाव दिया। ,
वहाँ जाकर दिनेश का इलाज कराया। यहॉ भी उसकी वही मांग जारी थी। मटकी चार नारियल चुनरी और सिंगार के सामान की। ,
पर पुजारी ने साथ साथ कुछ नीबू लौंग और कफन भी मंगवा लिया। इस बार की पूजा मुझे कुछ विशेष लगी।
पुजारी हर बार कुछ मंत्र पढ़ता और उसे नींबू में फूंक देता और उसमें लौंग चुभा देता। फिर उस नीबू को कफन में लपेट कर एक मटकी में डाल देता।
दिनेश को इससे बहुत दर्द होता और वो बेहोश हो जाता। होश में आकर दिनेश की फिर वही हरकतें चालू हो जाती थी।
पर पुजारी अपने काम में लगा रहा। जैसे ही उस आत्मा की बारी आई वो कहने लगी ’’मुझे छोड़ दो । मुझे छोड़ दो। जाने दो मुझे‘‘। पुजारीः ’’बोल तू इसे फिर परेशान करेगी‘‘।
’’नहीं करूंँगी। नहीं करूंँगी। मुझे माफ कर दो मुझे जाने दो‘‘।
पुजारी : ’’क्यों परेशान कर रही है इस बच्चे को। पीछा छोड़ इस बच्चे का। वापस जा‘‘। लौट जा जहाँ से भी तू आई है‘‘।
पुजारी ने ऐसा आठ से दस बार किया और तंत्रा को भी उसने कैद कर लिया। अंत में पुजारी ने वो मटकी हमें दी और कहा, ’’इस बच्चे के अंदर दुष्ट आत्माओं ने डेरा जमा लिया था।
सारी आत्माओं को इस मटकी में कैद कर दिया है। इसे ले जाकर शमशान में गाड दो और ध्यान रहे नंगे पैर ही जाना‘‘।
हम उस मटकी को शमशान गाड़ आये। ताज्जुब तो यह था पूरा रास्ता जंगल होकर गुजरता था। रास्ते में नगे पैरों पर एक भी कांटा ना चुभा। ऐसा लग रहा था जैसे रूई पर चलकर हम उस जगह तक पहुंचे थे। इसके बाद दिनेश ठीक तो हो गया पर काफी कमजोर हो चला था। केवल खाने और दवाईयों के लिए ही बिस्तर से उठ पाता था। ,
इस वाकिये के बाद मेरा उन चीजों पर भी विश्वास हो गया जिन्हें मैं पहले नहीं मानता था। पांच सालों तक इस मुसीबत को झेलने के बाद हमारी माली हालत खराब हो गई थी।
सर पर कर्जा हो गया था। धीरे-धीरे हम भाईयों ने वो कर्जा भी चुका दिया।
हम कई और दिनों तक दिनेश की देखभाल में रात भर जागते थे। मैं उसके खाने का समय पर दवाईयों का ध्यान रखता था।
रात में उठ-उठकर मैं देखता था दिनेश सो रहा है या नहीं। उसकी चादर ठीक कर देता था ताकि वो आराम से सो सके। आज भी मेरी यही आदत है।
बस यही बात थी ऐसा कहकर मुकेश चुप हो गया।

इस कहानी को ध्यान से सुनने के बाद अंत में मैंने मुकेश से कहा, ’’बेशक यह कहानी किसी के लिए बेमिसाल हो या ना हो लेकिन तुम दोनों भाईयों का आपसी प्यार बेमिसाल है।‘‘


"दरवाज़ा खोलो" bhoot ki kahani in hindi 

"दरवाज़ा खोलो" 
विनय एक बीमा कंपनी में काम करते है। उनकी कंपनी उनको एक जगह से दूसरे जगह ग्राहक से मिलने के लिए भेजती रहती है जिसके कारण वो अपना घर एक ठिकाने पर नहीं रख सकते थे|
          
        इस बार उन को नेपाल के छोटे से पहाड़ी इलाके में जाना था करीब 1 महीनो के लिए। इसलिए इस बार उन्होंने अपनी पत्नी को भी साथ ले लिया।

परिवार में सिर्फ वो और उनकी पत्नी ही रहती थी। विनय और उसकी पत्नी दोनों नेपाल के लिए निकल पड़े वैसे भी ठण्ड का मौसम था और नेपाल में ऊपर से बहुत तेज़ बर्फ पड़ रही थी।
वो लोग अपने घर पहुँच चुके थे। अपने घर तक पहुँचने के लिए उनको बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि घर छोटे से गाँव में एक पहाड़ी इलाके में था। जिसकी वजह से दोनों बहुत थक चुके थे।  रात के 12:30 बज चुके थे। जहाँ वो रह रहे थे वहाँ दूसरे घर एक दुसरो से बहुत दूर दूर थे।
बाहर ज़ोरो से ठंडी हवा और बर्फ गिर रही थी। दोनों अपने रजाई में दुबक कर आराम ही कर रहे थे की अचानक उनको लगा की किसी ने उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया है।
फिर उन्होंने सोचा की क्या पता तेज़ हवा चलने की वजह से ऐसा जो रहा हो इसी लिए उन्होंने उसको अंदेखा कर दिया। ,
अगली सुबह विनय जिस काम के लिए आया था उसके लिए वो निकल पड़ा उसकी पत्नी घर में अकेले ही थी।, उसको समझ नहीं आ रहा था कि वो घर में बैठे वक़्त कैसे बिताए उसने सोचा की चलो क्यों न बाहर जा कर ही कुछ देख लिया जाए।
बाहर ठण्ड तो थी पर हवा नहीं चल रही थी। इसी लिए उसने अपना स्वेटर पहना और बाहर निकलने को तैयार हो गयी जैसे ही उसने अपना घर का गेट खोला वैसे ही देखती है कि घर के पास बने एक खम्बे के पीछे एक छोटा सा बच्चा खड़ा है। जो उसको चुपके चुपके देख रहा है। विनय की पत्नी ने उसको अपनी और बुलाया पर वो नहीं आया और वो वहाँ से भाग गया।
अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ वो लड़का उसको फिर से घूरे देखा जा रहा था इस बार उसकी पत्नी ने उस बच्चे को पकड़ लिया और पूछा की तुम यहाँ क्या कर रहे हो।
उस बच्चे ने कुछ नहीं बोला और न ही कुछ बताया। विनय की पत्नी ने उससे उसके घर के बारे में पूछा तब भी वो कुछ नहीं बोल रहा था।
आखिर में उसका नाम पूछने पर उसने अपने धीमी सी आवाज़ में अपना नाम सूर्य बताया और फिर वहाँ से भाग गया।
उसको उसका व्यवहार कुछ समझ नहीं आया। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा वो बच्चा रोज़ उसको खम्बे के पीछे से निहारता रहता था।
उस दिन रविवार की रात थी दोनों घर में अँगीठी के सामने आग ताप रहे थे क्योंकि बाहर की हालत बहुत ख़राब थी इतनी ख़राब की कोई थोड़ी देर के लिए बाहर निकल जाए तो उसकी जान चली जाए।
        अचानक दरवाज़ा किसी ने खटखटाया उन दोनों को फिर से लगा की शायद हवा की वजह से ऐसा हो रहा हो।
तभी फिर से किसी ने दरवाजा खटखटाया। इस बार खटखटाने की आवाज़ साफ़ आरही थी। ,
ये आवाज़ सुन कर दोनों डर गए क्योंकि इतनी रात को वो भी जान ले लेने वाली ठण्ड में आखिर कोन हो सकता है।
दोनों केवल एक दूसरे का मुह देख रहे थे। अचानक दरवाज़े के बाहर से धीरे धीरे रोने की आवाज़ आने लगी। तभी विनय ने जोर से आवाज़ में बोला \कौन है बहार\
कुछ देर तक आवाज़ तो नहीं आई पर बाद में एक धीमी सी आवाज़ आई \दरवाज़ा खोलो\..... \कृपया करके दरवाज़ा खोलो, बहुत ठण्ड है।\
ये आवाज़ किसी छोटे से बच्चे की थी। तभी विनय की पत्नी को ये आवाज़ जानी पहचानी लगी उसने कहाँ कि ये तो वही बच्चे की आवाज़ लगती है जो रोज़ घर के बाहर खड़ा रहता था।
विनय की पत्नी ने कहा कि हमें उसे अंदर लाना चाहिये। वो भागते हुए अभी दरवाज़े के पास जा ही रही थी की अचानक उनके घर के फ़ोन की घंटी बाजी। ,
फोन एक पड़ोस में रहने वाली औरत का था जिससे आज ही विनय की पत्नी मिल कर आई थी।
           विनय की पत्नी ने फ़ोन उठाया। वहाँ से उस औरत की आवाज़ आई \हेल्लो, जी मै आपको बताना भूल गई थी की अगर आपके घर के बाहर कोई भी दरवाज़ा खटखटाए तो उसको मत खोलना।\
विनय की पत्नी ने कहा की \अभी मेरे घर जे बाहर एक बच्चे की आवाज़ आरही है जो दरवाज़ा खोलने को कह रहा है\
तभी उस औरत ने कहा कि \ नहीं आप बिलकुल मत खोलना, वो असल में एक आत्मा है। यहाँ जब जब तेज़ आंधी और ठण्ड पड़ती है वो तब तब सबके घर के बहार जाता है और दरवाज़ा खोलने को कहता है।
वो ठण्ड का बहाना बनाता है और दरवाज़ा खुलवाने की कोशिश करता है । अगर कोई गलती से भी दरवाज़ा खोल देता है तो वो अगले दिन बर्फ में दबा हुआ मिलता है।\
ये सुनते ही जैसे उनके पैरों से ज़मीन ही खिसक गयी। वो सोचने लगी की जो बाहर दरवाज़ा खटखटा रहा है वो असल में एक आत्मा है।
उन्होंने ने दरवाज़ा नहीं खोला अगले दिन ही वो दोनों भाग कर पडोसी के पास गए और पूरे मामले के बारे में पूछा।
उस औरत ने बताया कि इस गाँव में एक परिवार रहता था पहाड़ टूटने की वजह से उस परिवार का विनाश हो गया बस एक बच्चा बच गया।
वो दुसरो के घर जा जा कर खाना मांगता। एक दिन बहुत ज़ोरो से बर्फ की आंधी पड़ रही थी।
              वो दुसरो के घर के बाहर दरवाज़ा खटखटा कर घर के अंदर आने को गुहार लगा रहा था।
पर किसी ने भी उसकी गुहार नहीं सुनी ठण्ड की वजह से सब अपने घरों में दुबके हुए थे। कल सुबह होने पर उस बच्चे की लाश बर्फ में अकड़ी हुई मिली।
आज भी कभी भी ज़ोरो से बर्फ की आंधी आती है तो उसकी आत्मा सबके घर के पास आती है और गुहार लगाती है। ये सब सुन कर दोनों हैरान रह गए।

लेकिन वो वहाँ 1 महीने जब तक रहे तब तक 3-4 बार उनके साथ ऐसा ही हुआ। लेकिन विनय का काम खत्म हो जाने पर वो वहाँ से चले गए।           पर विनय की पत्नी में दिमाग में एक रहस्य हमेशा बना रहा की उस घटना के बाद जो बच्चा उसे रोज़ घर के बाहर दिखता था वो कभी नहीं दिखा।

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